
हिंदू धर्म और तंत्र शास्त्र में दस महाविद्याओं का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इन दस महाविद्याओं में दूसरी महाविद्या माँ तारा (Maa Tara) हैं। तारा का अर्थ है “तारने वाली” या “पार लगाने वाली”। जिस प्रकार घने अंधकार में एक तारा दिशा दिखाता है, उसी प्रकार माँ तारा भवसागर (जीवन-मरण के चक्र) और घोर संकटों से अपने भक्तों को पार लगाती हैं।
माँ तारा को मुख्य रूप से तांत्रिकों की देवी माना जाता है, लेकिन वे मोक्ष और ज्ञान की भी देवी हैं। विद्या, वाक्-पटुता (Communication) और शत्रुओं के नाश के लिए माँ तारा की साधना अचूक मानी जाती है। आइए इस विस्तृत लेख में माँ तारा के जन्म की कथा, उनके स्वरूप, मंत्र, और पूजा विधि के बारे में विस्तार से जानते हैं।
1. माँ तारा कौन हैं? (Who is Maa Tara?)
माँ तारा दस महाविद्याओं में माँ काली के बाद दूसरी प्रमुख देवी हैं। ऐसा माना जाता है कि माँ काली का ही एक अन्य रूप तारा है, लेकिन तारा का स्वरूप काली से थोड़ा भिन्न है। जहाँ माँ काली का रंग गहरा काला है, वहीं माँ तारा का रंग गहरा नीला (Blue) है। इसलिए इन्हें ‘नील सरस्वती’ (Neel Saraswati) भी कहा जाता है।
तंत्र साधना में माँ तारा का स्थान सर्वोपरि है। बौद्ध धर्म (विशेषकर वज्रयान और तिब्बती बौद्ध धर्म) में भी माँ तारा की पूजा अत्यंत श्रद्धा के साथ की जाती है। वे हिंदू और बौद्ध दोनों ही परंपराओं में एक समान पूजनीय हैं।
2. माँ तारा की उत्पत्ति की कथा (Origin Story of Goddess Tara)
माँ तारा की उत्पत्ति के संबंध में पुराणों और तंत्र ग्रंथों में कई कथाएं वर्णित हैं, जिनमें से सबसे प्रमुख कथा ‘समुद्र मंथन’ से जुड़ी है।
समुद्र मंथन और हलाहल विष की कथा
जब देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया, तो उसमें से चौदह रत्न निकले। लेकिन अमृत निकलने से पहले समुद्र से हलाहल (कालकूट) विष निकला। यह विष इतना भयंकर था कि इसकी गर्मी से पूरा ब्रह्मांड जलने लगा।
सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष को पी लिया और उसे अपने कंठ (गले) में रोक लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। लेकिन विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि शिवजी के शरीर में भयंकर जलन होने लगी और वे अचेत होने लगे।

अपने पति की यह पीड़ा देखकर माता पार्वती ने एक अत्यंत उग्र और मातृ रूप धारण किया, जो माँ तारा का रूप था। माँ तारा ने शिवजी को एक छोटे बालक के रूप में अपनी गोद में लिया और उन्हें अपना स्तनपान कराया। माँ तारा के दूध में वह अमृत तत्व था जिसने हलाहल विष के भयंकर प्रभाव को शांत कर दिया और शिवजी को पीड़ा से मुक्त किया। इसी कारण माँ तारा को शिव की रक्षक और तारने वाली देवी कहा जाता है।
महर्षि वशिष्ठ और तारा साधना
एक अन्य कथा के अनुसार, महर्षि वशिष्ठ ने कई वर्षों तक माँ तारा की तपस्या की लेकिन उन्हें सिद्धि प्राप्त नहीं हुई। तब उन्हें भगवान बुद्ध (जो विष्णु के अवतार माने जाते हैं) के पास जाने का निर्देश मिला। चीन (तिब्बत) जाकर वशिष्ठ मुनि ने वामाचार (तांत्रिक विधि) से माँ तारा की उपासना की और तब जाकर माँ तारा ने उन्हें दर्शन दिए।
3. माँ तारा के तीन मुख्य स्वरूप (3 Forms of Maa Tara)
तंत्र शास्त्र के अनुसार माँ तारा के तीन मुख्य स्वरूप माने गए हैं, जो व्यक्ति की अलग-अलग मनोकामनाओं को पूरा करते हैं:
- उग्र तारा (Ugra Tara): यह माँ का सबसे रौद्र रूप है। इस रूप में माँ भयंकर विपत्तियों, संकटों और शक्तिशाली शत्रुओं का नाश करती हैं। जब जीवन में हर तरफ अंधकार हो और कोई रास्ता न दिखे, तब उग्र तारा की साधना की जाती है।
- नील सरस्वती (Neel Saraswati): यह माँ का ज्ञान और विद्या का स्वरूप है। जो छात्र या व्यक्ति अपनी वाणी (Speech), बुद्धि, रचनात्मकता और ज्ञान में वृद्धि चाहते हैं, वे नील सरस्वती की उपासना करते हैं। यह रूप मूढ़ (मूर्ख) व्यक्ति को भी महाज्ञानी बना सकता है।
- एकजटा (Ekajata): इस रूप में माँ के सिर पर जटाओं का एक जूड़ा (जूट) बंधा होता है। यह स्वरूप मोक्ष प्रदान करने वाला और संसार के मोह-माया से मुक्ति दिलाने वाला है।
4. माँ तारा का शारीरिक स्वरूप और उसका रहस्य (Iconography & Meaning)
माँ तारा का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक लगता है, लेकिन इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा है:
- गहरा नीला रंग: उनका रंग नीलमणि के समान नीला है, जो अनंत आकाश और ब्रह्मांड की विशालता का प्रतीक है।
- प्रत्यालीढ़ मुद्रा: वे शिव (शव रूप में) के सीने पर अपना बायां पैर रखकर खड़ी हैं। यह दर्शाता है कि बिना शक्ति (तारा) के शिव (चेतना) भी शव के समान निष्क्रिय हैं।
- चार भुजाएं: माँ की चार भुजाएं हैं। उन्होंने अपने हाथों में खड्ग (तलवार), कैंची (कर्तरी), कपाल (खप्पर) और नीला कमल धारण किया हुआ है।
- तलवार: अज्ञानता को काटने का प्रतीक।
- कैंची: यह अहंकार और सांसारिक बंधनों को काटने का प्रतीक है।
- कपाल (खप्पर): नकारात्मक विचारों और कर्मों का नाश करने का प्रतीक।
- कमल: कीचड़ (संसार) में रहते हुए भी पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक।
- बाघ की खाल: माँ ने बाघम्बर (बाघ की खाल) लपेटी हुई है, जो क्रोध और पशु प्रवृत्ति पर नियंत्रण को दर्शाता है।
- मुण्ड माला: उनके गले में कटे हुए सिरों की माला है, जो वर्णमाला (संस्कृत के अक्षरों) और शब्द-ब्रह्म का प्रतीक है।
5. माँ तारा और माँ काली में क्या अंतर है? (Difference between Kali and Tara)
अक्सर लोग काली और तारा को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन तांत्रिक दृष्टि से इनमें कुछ भेद हैं:
- रंग: माँ काली का रंग श्याम (काला) है, जबकि माँ तारा का रंग गहरा नीला है।
- अस्त्र: माँ तारा के हाथों में कैंची (कर्तरी) होती है, जो माँ काली के पास नहीं होती। तारा कमल भी धारण करती हैं।
- पैर की स्थिति: माँ काली अपना दाहिना (Right) पैर शिव पर रखती हैं, जबकि माँ तारा अपना बायां (Left) पैर शिव के सीने पर रखती हैं (जिसे प्रत्यालीढ़ मुद्रा कहते हैं)।
- गुण: काली संहार की देवी हैं, जबकि तारा विपत्तियों से निकालकर ज्ञान की ओर ले जाने वाली देवी हैं।
6. माँ तारा के शक्तिशाली मंत्र (Maa Tara Powerful Mantras)
माँ तारा की साधना मंत्रों के बिना अधूरी है। उनके मंत्रों में अपार ऊर्जा होती है। (चेतावनी: किसी भी तांत्रिक मंत्र का जाप बिना गुरु दीक्षा के नहीं करना चाहिए। सात्विक पूजा के लिए आप सामान्य नाम मंत्र या बीज मंत्र का जाप कर सकते हैं।)
1. माँ तारा का बीज मंत्र (Tara Beej Mantra)
“ह्रीं स्त्रीं हुं फट्” (यह तारा का एकाक्षरी/बीज मंत्र है। इसका जाप रुद्राक्ष की माला से करने पर आर्थिक और मानसिक परेशानियां दूर होती हैं।)
2. नील सरस्वती मंत्र (Neel Saraswati Mantra – For Students & Knowledge)
“ॐ ह्रीं श्रीं हुं फट्” (बुद्धि, स्मरण शक्ति और वाक्-सिद्धि प्राप्त करने के लिए यह मंत्र अत्यंत फलदायी है। विद्यार्थी इसका नित्य जाप कर सकते हैं।)
3. माँ तारा गायत्री मंत्र (Tara Gayatri Mantra)
“ॐ तारायै विद्महे महोग्रायै धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्॥” (यह एक सात्विक मंत्र है। इसका जाप मानसिक शांति, भय से मुक्ति और देवी की कृपा पाने के लिए कोई भी कर सकता है।)
7. माँ तारा की पूजा विधि (How to Worship Maa Tara)

माँ तारा की पूजा मुख्य रूप से रात्रि के समय (विशेषकर निशीथ काल या मध्यरात्रि) में की जाती है। आम गृहस्थ उनकी सात्विक पूजा कर सकते हैं:
आवश्यक सामग्री: नीले या लाल रंग के फूल (गुड़हल या अपराजिता), रोली, सिंदूर, अक्षत, धूप, दीप (सरसों के तेल या घी का), नीले या काले रंग का वस्त्र, और प्रसाद में मीठा (खीर या हलवा)।
पूजा के चरण (Steps):
- स्नान और वस्त्र: रात्रि के समय (लगभग 9 बजे के बाद) स्नान करके नीले या गुलाबी वस्त्र धारण करें।
- आसन और दिशा: उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
- चौकी स्थापना: एक लकड़ी की चौकी पर नीला या गुलाबी कपड़ा बिछाएं और माँ तारा का चित्र या यंत्र स्थापित करें।
- संकल्प और ध्यान: हाथ में जल लेकर पूजा का संकल्प लें और माँ तारा के स्वरूप का ध्यान करें।
- पंचोपचार पूजा: माँ को जल अर्पित करें, रोली/सिंदूर का तिलक लगाएं, नीले फूल चढ़ाएं, धूप और दीप दिखाएं।
- नैवेद्य: माँ को प्रसाद अर्पित करें।
- मंत्र जाप: रुद्राक्ष या स्फटिक की माला से माँ तारा के गायत्री मंत्र या बीज मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
- आरती और क्षमा प्रार्थना: अंत में माँ की आरती करें और अपनी भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें।
8. माँ तारा की पूजा और साधना के अद्भुत लाभ (Benefits of Maa Tara Puja)
जो भी साधक माँ तारा की सच्चे मन से उपासना करता है, उसे निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- अकाल मृत्यु और संकटों से रक्षा: माँ तारा की कृपा से साधक के जीवन में आने वाले अचानक संकट और दुर्घटनाएं टल जाती हैं।
- वाक् सिद्धि और ज्ञान (Communication & Knowledge): नील सरस्वती रूप की पूजा करने से व्यक्ति की वाणी में ओज आता है। वह जो बोलता है, वह सत्य होने लगता है। कवि, लेखक, और वक्ताओं के लिए यह साधना वरदान है।
- शत्रु बाधा से मुक्ति: मुकदमों में जीत और गुप्त शत्रुओं के नाश के लिए माँ उग्र तारा की पूजा रामबाण है।
- आर्थिक उन्नति: माँ तारा की उपासना से गरीबी दूर होती है और धन-धान्य की प्राप्ति होती है।
- मोक्ष प्राप्ति: तारा का अर्थ ही है तारने वाली। वे साधक को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करती हैं।
9. विश्व प्रसिद्ध तारापीठ (Tarapith) और इसका रहस्य
जब भी माँ तारा का जिक्र होता है, तो पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित ‘तारापीठ’ (Tarapith) का नाम सबसे ऊपर आता है। यह एक सिद्ध महापीठ है।
तारापीठ की मान्यता: पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव सती के मृत शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे। मान्यता है कि तारापीठ वह स्थान है जहाँ माता सती की नेत्र (आंख की पुतली/तारा) गिरी थी।
महाश्मशान: तारापीठ के पास एक द्वारका नदी बहती है और वहीं एक महाश्मशान है। इस श्मशान में चिता की आग कभी नहीं बुझती। अघोरी और तांत्रिक तंत्र साधना के लिए यहाँ देश-विदेश से आते हैं। प्रसिद्ध तांत्रिक संत बामखेपा (Bamakhepa) माँ तारा के परम भक्त थे, जिन्होंने इसी श्मशान में माँ की आराधना कर सिद्धियां प्राप्त की थीं।
10. निष्कर्ष (Conclusion)
दूसरी महाविद्या माँ तारा केवल तांत्रिकों की ही देवी नहीं हैं, बल्कि वे एक करुणामयी माता भी हैं जो अपने बच्चों को जीवन के हर तूफान से बाहर निकालती हैं। उनकी साधना हमें जीवन में निर्भयता, असीम ज्ञान और परम शांति प्रदान करती है। भौतिक इच्छाओं से लेकर आध्यात्मिक मोक्ष तक, माँ तारा अपने भक्तों की हर पुकार सुनती हैं।
अगर आप भी जीवन के किसी कठिन दौर से गुजर रहे हैं, तो माँ तारा के मंत्रों का स्मरण अवश्य करें, वे निश्चय ही आपका बेड़ा पार लगाएंगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs about Maa Tara)
Q1: माँ तारा की पूजा किस दिन करनी चाहिए? Ans: माँ तारा की पूजा के लिए गुरुवार (बृहस्पतिवार) का दिन, अष्टमी, नवमी या अमावस्या की रात सबसे उत्तम मानी जाती है। नवरात्रि (विशेषकर गुप्त नवरात्रि) में इनकी साधना का विशेष महत्व है।
Q2: क्या गृहस्थ लोग माँ तारा की पूजा कर सकते हैं? Ans: हाँ, गृहस्थ लोग माँ तारा के ‘नील सरस्वती’ या सौम्य रूप की पूजा कर सकते हैं। गृहस्थों को तांत्रिक साधनाओं (वामाचार) से बचना चाहिए और केवल सात्विक पूजा, आरती और गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए।
Q3: माँ तारा को क्या चढ़ाना पसंद है? Ans: माँ तारा को नीले रंग के फूल (अपराजिता), नारियल, खीर, और अनार अत्यंत प्रिय हैं।
Q4: तारापीठ कहाँ स्थित है? Ans: तारापीठ एक सिद्ध शक्तिपीठ है जो भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के बीरभूम जिले में स्थित है।
Q5: माँ तारा और बौद्ध देवी तारा में क्या संबंध है? Ans: दोनों का मूल एक ही है। वज्रयान बौद्ध धर्म में तारा को एक प्रमुख बोधिसत्व और रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है (जैसे ग्रीन तारा और व्हाइट तारा), जो हिंदू धर्म की महाविद्या तारा के ही समतुल्य मानी जाती हैं।

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